Wednesday, 4 February 2015


                                                               बबली 
उस दिन सुबह से ही तेज बारिश हो रही थी मैंने रोज की तरह अपनी बेटीयों को तैयार किया और मेरे पति राहुल उन दोनो को लेकर कार मे बैठे और उन्हे स्कुल छोडने के लिये निकल पडे मैने दोनो को टाटा बाय -बाय किया, जैसे ही उनकी कार गई और यहॉ कोहराम मच गया, हमे मालुम ही नही था कि कार के नीचे बबली और उसके नवजात बच्चे सो रहे थे बारिश तेज थी जिस कारण से उनके ऊपर से छत निकल जाने से सब जोर जोर से पीं पीं करके चिल्लाने लगे, बबली हमारी कॉलोनी की एक कुतिया थी जो कई सालों से हमारे दो - चार घरों के आस-पास ही रहती थी चुँकि हम उसे खाने पीने को दिया करते थे, जिस कारण से वह हमे अपना ही समझने लगी थी, हमे भी उसके इस अपनत्व का एहसास था इसीलिये हम भी उसका ध्यान रखते थे, उस दिन इतनी तेज बारिश मे शायद रात को ही उसने हमारी कार के नीचे अपना ठिकाना बनाया होगा, जो हमे पता ही नही था । वो तो खुदा का शुक्र है कि कोई भी आहत नही हुआ, उन्हे देखकर लग रहा था कि बबली ने अभी दो-तीन दिन पहले ही इन पिल्लों को जन्म दिया होगा, ये सब हमारे लिये आम बात थी, वह हर साल एक खेप तो जन ही लेती थी उनमे से कुछ गाडियों के नीचे आ जाते तो कुछ बच जाते, जो बच जाते वे भी हमसे उतने ही वफादार थे ।
 “ बबली “  ये नाम भी हमने ही उसका प्यार से रखा था, पहले उसका एक साथी कुत्ता भी था और ये जोडा हमेशा साथ ही रहा करता था और उसी समय फिल्म बंटी और बबली भी रिलीज हुई थी सो हमने इस जोडे का नाम भी यही रख दिया था पर कुछ दिनो से बंटी कॉलोनी मे दिखाई नही दे रहा था, मालुम नही कहॉ चला गया था पर बबली फिर भी हमारे दो - तीन घरों के आस पास ही रहती थी । अब इधर ये कोहराम तेज बारिश देख कर मुझे कुछ सुझ नही रहा था, बबली के बच्चे बारिश मे भीग रहे थे और बबली हैरान परेशान होकर रोने लगी तभी उसने हमारे पास के खाली प्लॉट से लगी महाशब्दे जी के घर की दिवार के सहारे गडडा खोदना शुरु कर दिया इधर मुझे उन बच्चों को उठाने मे डर लग रहा था सो मै अपनी छतरी लेकर उनके पास बैठ गई ताकि वे बारिश से ना भीगे और राहुल का इंतजार करने लगी, कि वो आये तो हम इनके लिये कुछ कर सके, तब तक बबली ने भी गड्डा खोदना जारी रखा जैसे ही उसने मुझे उसके बच्चों के समीप बैठे देखा वो थोडी शांत हुई और अब एकाग्रता से अपने बच्चो की व्यवस्था मे लग गई फिर कुछ ही देर मे वो मेरे पास आयी और मुँह मे होले से अपने एक बच्चे को उठाया और उस गड्डे मे रख दिया यह देखकर मुझे एहसास हुआ कि माँ तो माँ ही होती है चाहे इन्सान की हो या किसी अन्य जीव की माँ का कोई सानी नही है सचमुच बच्चो के लिये तो धरती पर भगवान का दुसरा रुप ही माँ है जो हर हाल मे अपने बच्चे के लिये सबकुछ करती है, अपनी खुद की परवाह किये बिना, जो आज ये जानवर बबली भी कर रही है, उतने मे ही राहुल भी आ गए वे माँजरा भाँप कर तुरंत घर के अन्दर जाकर एक ताट का बोरा ले कर आए और हमारे घर के बरामदे मे बिछा कर जल्दी से एक-एक करके उन पिल्लों को उठाकर अंदर रख दिया ये देखते ही बबली भी अंदर दौडी चली आयी और अब सभी हमारे घर के बरामदे मे सुरक्षित और शांत थे बारिश कभी तेज कभी रिमझीम ऎसे लगातार चलती रही, अब दो दिन तो हमने जैसे तैसे निकाल दिए पर मेरी भी दो छोटी बेटीयॉ है उन्हे इन्फेक्शन ना हो जाए यह सोच कर हम कॉलोनी मे ऎसी जगह तलाश करने लगे जहाँ ये सब सुरक्षित रह सके तब हमने देखा कि हमारे कॉलोनी मे एक घर करीब दो-तीन सालॊ से बंद पडा है तो फिर क्या था हमने व हमारे पडोसी लबडे जी ने मिलकर उन्हे सकुशल उस सुने मकान के बरामदे मे शिफ्ट कर दिया ओर उनके सारे खाने-पीने की व्यवस्था कर दी तभी शाम को उस सुने मकान के पास मे रहने वाली एक आंटी आयी ओर मुझे बोली तुमने किसकी इजाजत से वहॉ उस कुतिया ओर उसके बच्चों को रखा उस मकान की जवाबदारी हमारे पास है ओर वहॉ उन सबने कितनी गंदगी कर दी है देखो जरा, तब मैने कहा आंटी चलो मे सब साफ कर देती हूँ और कुछ दिनो की बात है बारिश का मौसम भी चला जाएगा और बच्चे भी थोडे बडे हो जाऎंगे तब वहॉ कोई नही आएगा आप चिंता मत करो मैने सोचा था ये आंटी बडी "धार्मिक" हैं रोज सुबह जल्दी उठ कर मंदिर जाती हैं बिना नागा किए बहुत सेवा भावी भी हैं वो इस बात को समझ जाएंगी परन्तु वो नही मानी तब पता चला इन्सानियत केवल इंसानो के लिये ही होती है, भगवान के बनाए अन्य प्राणीयों के लिये नही होती है, आखिर वे नही मानी फिर हमने और लबडे जी ने मिलकर पुनः उसी खाली प्लॉट की दीवार के सहारे दो तरफ ईटें रखकर उस पर एक छतरी रख दी और वहॉ उन्हे शिफ्ट कर दिया पर देखिये रातभर मे पता नही वो छतरी ही कोई उठाकर ले गया तब फिर लबडे जी ने उन इटों पर प्लास्टिक की शीट व्यवस्थित जमा कर रख दी पर इन सब मे बारिश मे भीगने की वजह से और इंफेक्शन से बबली के दो पिल्ले चल बसे जिन्हे राहुल ने हमारे घर के सामने वाले ग्रीन फिल्ड एरिया मे दफना दिया, बाकीयों को हम, मिरजकर जी, चंदानी जी बारी बारी से ध्यान रख रहे थे तभी अचानक एक दिन बबली गायब हो गई उसके पिल्ले भुख के मारे रोने लगे हमने उन्हे कटोरे मे दुध दिया पर उन्हे पीते भी नही आ रहा था पर भुख भी लग रही थी उन्होने कटोरे पर ही पैर दे मारा तो सारा दुध वंही पर ढुल गया जिसे धीरे धीरे उन्होने चाटना शुरू किया और शायद तभी उन्हे समझ आया था कि उपर का दुध कैसे पीया जाता है, दो दिन ऎसे ही चलता रहा हम बबली को ढुंढ रहे थे और सोच रहे थे की वो ऎसे कैसे कँही भी चली गई अपने दुध मुँहे बच्चों को छोडकर कुछ भी समझ नही आ रहा था कि कब तक हम इनका ध्यान रखेंगे, रात को कुछ हो गया तो फिर ? ऎसी कई आशंकाओ से हम सब परेशान हो रहे थे पर बबली का कुछ अता पता नही था तब एक दिन अलसुबह राहुल घुमने निकला, तो उसने रिंग रोड पर साइड मे पडे एक कुत्ते की रोने की आवाज सुनी और जैसे ही वह उसके पास गया वह कुत्ता ओर जोर से रोने लगा उसने करीब पहुँच कर देखा तो वह ओर कोई नही बबली ही थी वह भी घायल अवस्था मे, ओर उठ भी नही पा रही थी उसने राहुल को पहचान लिया था इसीलिये जोर जोर से कराह कर उसे अपने पास बुलाना चाहती थी राहुल ने उसे प्यार से सहलाया तो वो और जोर से कराहने लगी अब तक राहुल समझ चुका था कि बबली के लिये किसी वेटेनरी डॉक्टर को बुलाना ही पडेगा यह सोच कर वह घर पर आने के लिये बढा तो वह और रोने लगी शायद वह बिना बोले भी आँखों से बोल रही थी प्लिज मुझे छोड कर मत जाओ, मेरी मदद करो परन्तु कुछ भी एक्शन लेने के लिये घर आना जरुरी था क्योंकि उसके पास उस समय सेलफोन भी नही था वह तुरंत घर आया और सारा माजरा हमे बताया ये सुनते ही मै और मेरी भांजी रुचि हम दोनो से रहा नही गया हम दौडते हुए बबली के पास पहुँचे वह हमे दुर से ही देखकर पहचान गई और जोर जोर से कराहने लगी उधर राहुल हमारे परिचीत वेटेनरी डॉ. सिरवानी जी को फोन लगाने मे व्यस्त था इधर बबली जोर जोर से कराह रही थी और हम उसे सहला कर सांत्वना देने की कोशिश कर रहे थे उतने मे ही एक सज्जन जो स्कुटर से जा रहे थे वे रुके और एक ब्रेड का पेकेट लेकर हमारे पास आए और बोले क्या ये आपका कुत्ता है? मैने कहा नही पर हम इसे जानते हैं ये हमारी कालोनी की है तब वे बोले इसका एक्सिडेंट कल मेरी कार से ही हुआ है, और तब से मै बेचैन हूँ सुबह भी मै दो बार आया पर ये कुछ खा नही रही है मै इसका इलाज भी कराना चाहता हूँ क्या आप लोग मेरी मदद करेंगे? इसका ये हाल मेरी ही वजह से हुआ है इसके लिये मुझसे जो बन पडेगा मै करने को तैयार हूँ । रुचि और मै हम दोनो ही आश्चर्य से उस सज्जन की ओर देखने लगे उन सज्जन की आँखों मे प्रायश्चित की भावना और बबली को हो रहे दर्द का एहसास साफ दिख रहा था तभी राहुल आया ओर बोला डॉ सिरवानी तो आउट ऑफ स्टेशन है अब तो हम ये ही कर सकते हैं कि या तो इसे कार मे डाल कर वेटेनरी हॉस्पिटल ले जाऎं या फिर वहा से किसी को बुला कर लाऎ तभी हमारे पडॊसी चंदानी जी का भतीजा भी हमारी मदद के लिये आया तब राहुल तुरंत कार लेकर आया और एक बोरी की सहायता से वे दोनो मिलकर बबली को उठाने का प्रयास करने लगे पर बबली को इतना ज्यादा दर्द हो रहा था कि वह खुद को उठाने नही दे रही थी इस वजह से यह भी डर लग रहा था कि कहीं ये काट ना ले सो राहुल मुझसे बोला एक काम करो तुम वेटेनरी हॉस्पिटल जाओ ओर देखो कोई वहां से आ सकता हो तो उसे ले आओ तब तक हम इधर कोशिश करते हैं यदि इसे हमने कार मे बैठा लिया तो मै तुम्हे कॉल कर दुंगा जानवरों का हॉस्पिटल हमारे घर से तीन चार कि.मी. की दुरी पर ही था, मैने हाँ कहा ओर जाने को निकली कि तभी वे सज्जन बोले चलो मै भी आपके साथ चलता हूँ मै राहुल कि ओर देखने लगी तो राहुल बोला ठीक है और फिर वे सज्जन और मै हम दोनो उन्ही की स्कुटर से वेटेनरी हॉस्पिटल पहुँचे, ये सरकारी अस्पताल था हमारी बात भी कोई सुनने को तैयार नही था तब मेरे साथ आए सज्जन ने वहां के एक हेल्पर को सौ रुपये दिये ओर सारा माजरा बताया और उनसे हमारे साथ चलने का अनुरोध किया पॉकेट मे सौ रुपये आते ही उसने उसके बॉस डॉ. से परमिशन लेकर तुरंत चलने को तैयार हो गया तभी मेरे सेलफोन पर राहुल का कॉल आया उसने कहा हमने जैसे तैसे बबली को कार मे बैठा लिया है तुम वही रुको हम वहीं आ रहे है तो फिर हम वही रुक गए , जब ये लोग बबली को लेकर कार से आए तो हम सभी की एक स्ट्रीट डॉग(बिच) के लिये ये उठा पटक देख कर डॉ भी अपनी चेअर से उठ कर कार मे ही बबली को देखने पहूँचे और चेक करने के उपरान्त उन्होने बताया की इसकी रीढ की हडडी जा चुकी है जिसकी वजह से इसके पिछले पैर पेरालाइस्ड हो गए है मै दवाई लिख देता हूँ तो इसका दर्द कम हो जाएगा पर अब ये ठीक तो नही हो पाएगी ये सब सुन कर हम सभी हताश हो गए तभी राहुल बोला मै दवाई लेकर आता हूँ फिर चलते हैं तब वे सज्जन बोले आप लोग चलिये दवाईयां मे ले आता हूँ उनकी आँखों मे पानी भर आया था जो हम सभी को साफ दिखायी दे रहा था, मैने अपनी जिन्दगी मे पहली बार इतना भावुक पुरुष देखा था जिसे अपनी गलती की वजह से एक अनजान जानवर को हो रहे तकलीफ से इतना दर्द हो रहा था, कि वो उनकी आँखों से बह रहा था हम सबने उन्हे समझाया और घर की ओर निकलने लगे तभी वहा खडे सभी लोग जो ये सब देख रहे थे, उनमे से वह हेल्पर जिसने सौ रुपये लिये थे उसे पता नही क्या हुआ उन सज्जन के समीप आया ओर सौ रुपये उनके हाथ मे वापस थमा कर उनके कंधे पर सांत्वना भरा हाथ रख कर चला गया ये सब देखकर उस दिन ऎहसास हो रहा था कि आज भी इन्सानो मे इतनी इन्सानियत और भावनाए दबी हुइ है जो कंही इस कलयुगी भौतिक लालसा के दौड मे किसी मे दिखायी ही नही देती है पर फिर भी, आज भी सभी का नैतिक पतन नही हुआ है खैर बाद मे हम सब निराश होकर लौट आए अब रोज हम कालोनी वाले बारी बारी से बबली को खाना देना, दवाई देना वो जब कभी रोए तो उसे सांत्वना देना सब यूं ही चल रहा था, दो दिन बाद हमारे परिचित वेटेनरी डॉ सिरवानी जी को भी हमने बुलाया जो उस दिन आउट ऑफ स्टेशन थे उन्होने भी बबली को देखा ओर वही कहा जो अस्पताल के डॉक्टर ने हमसे कहा था उन्होने बबली को दर्द ना हो उसका एक इंजेक्शन उसे लगाया और अपनी तरफ से कुछ टॉनिक देकर बिना फीस लिये ही चले गए | वे सज्जन भी आठ दिन तक रोज अपनी कम्पनी से सीधे हमारे घर ब्रेड और दुध की एक थैली बबली के लिये ले कर आते, कुछ दिनो बाद बबली ने खाना पीना भी छोड दिया तब हमने उन सज्जन को बताया कि अब वो कुछ भी खा नही रही है प्लिज अब आप उसके लिये कुछ भी मत लाइये, वे बडे उदास होकर चले गए उस दिन के बाद उनका आना भी बंद हुआ, उसके दुसरे दिन बबली अपने शरीर को घसीटते घसीटते बाहर सडक पर आ गई और रात भर मे ही पता नही सरकते सरकते कंही चली गई इधर पता नही कैसे उसके दो पप्पी ओर चल बसे बाकी बचे हुए तीन को हमने अपने घर के नजदीक जगह बना दी थी और अब वे भी धीरे धीरे सामान्य जिन्दगी जीने लगे थे यंहा तक की आस-पास के बच्चों के साथ खेलने भी लगे थे तभी दो-तीन दिन बाद बबली पुनः अपने बच्चो के पास आयी सारा दिन उनके साथ रही, हमने देखा वो अपने बच्चो को बहुत प्यार कर रही थी, फिर रात मे पता नही कहॉ चली गई, इधर उसका इन्फेक्शन इन बचे हुए पिल्लों को भी हो गया जिससे एक के बाद एक तीनो चल बसे फिर कुछ दिन बाद पता चला कि मेन रोड के किनारे ही बबली ने भी दम तोड दिया इस तरह उसका और उसकी आखरी खेप का दर्दनाक अन्त हुआ हम कई दिनो तक उसे भुला नही पाए |