सभी स्कूलों का
नया सत्र शुरु होने वाला है, कोई उसी स्कूल मे है तो कोई फीस
बढने की वजह से
किसी अन्य स्कूल मे जाने की सोच रहा है आज जितने माता-पिता या अभिभावक बच्चों के
स्कुल एडमीशन को लेकर ऊहापोह की स्थिती मे रहते हैं उतने
शायद कुछ साल पहले तक ये स्थिती नही थी चुँकि हर अभिभावक अपने बच्चों को अच्छे से
अच्छे स्कूल मे
दाखिल कराना चाहते हैं साथ ही बजट भी देखना होता है फिर बच्चे का सर्वांगिण विकास
भी चाहते हैं जिसके तहत वह फर्राटेदार अंग्रेजी भी बोलना सीखे, किसी एक्टिवीटी मे भी बच्चा महारत हो, बच्चे सभ्य व
संस्कारी भी हो, वो स्मार्ट भी हो और वह जमाने के साथ
जैसे को तैसे वाला भी हो ये सभी स्कूल से ही मिलना चाहिये इसलिये
एक बहुत अच्छे स्कूल की
तलाश रहती है, सही भी है, बच्चे को एक अच्छा
आधार देने के लिये एक अच्छे स्कूल की दरकार तो होती ही है, अब यदि अभिभावक उच्च वर्ग अर्थात जिन्हे रुपये पैसों की कोई कमी नही है, उन्हे बेझिझक
किसी भी बडे स्कूल मे
एडमीशन कराने मे कोई मुश्किल नही आती यंहा तक की चाहे जो स्कूल की फीस हो वो
देने के लिये भी तैयार होते हैं, क्योंकि कुछ लोगों का तो स्टेटस
सिंबल भी होता है की हमारा बच्चा इतने महँगे स्कूल मे पढता है
वहीं निम्न वर्ग अर्थात सीमित आय वाले किसी भी मध्यम स्कूल मे दाखिला कराने को
मजबुर होता है क्योंकि उसे किसी भी तरह अपने बच्चे को पढाना तो है और वे यहां
समझौता कर लेते है, पर सबसे बडी समस्या मध्यम वर्गीय आय वाले अभिभावको
के साथ आती है, वे शिक्षा के मामले मे किसी भी प्रकार से
समझौता करना नही चाहते, वे अपने बच्चे को अच्छे से अच्छे स्कूल मे दाखिल
कराना चाहते हैं चुँकि इस श्रेणी मे ज्यादातर नौकरी पेशा लोग है या फिर छोटे
व्यवसायी है| ये वर्ग दिन रात अपना स्टेट्स बढाने मे लगा होता है और ये
अपने बच्चों को इतना संघर्ष नही करवाना चाहते जितना ये खुद कर रहे होते हैं, जिसके चलते वे उन्हे अच्छे से अच्छे स्कूल मे एडमीशन
करना चाहते है, जंहा इनका बच्चा स्मार्ट बने और बडा होकर उच्च पदों
पर आसिन हो या सफल व्यवसायी बने जिसके लिये अच्छा स्कूल और अच्छा
शिक्षण ही एकमात्र विकल्प होता है, पर समस्या तब आती है
जब किसी बडी स्कूल मे बच्चे को दाखिल कराने के बाद
जैसे तैसे उस स्कूल की
फीस के साथ अपने बजट का सामजस्य बैठाते हैं और उधर हर साल स्कूल अपनी फीस
बढाती जाती है तो बस मध्यम वर्गीय परिवार की तो अर्थव्यवस्था ही गडबडाने लगती है उस पर हर साल कुछ
पुस्तकों मे थोडा सा तब्दिल कर देना जिससे आपको विवश कर दिया जाता है नये पुस्तक
खरिदने के लिये, जहां हमने तो पाचवी कक्षा से कॉलेज तक सेकण्ड हेंड
पुस्तके पढ के या पुस्तकालय से पढ के निकाल दी ये हर साल कोर्स मे थोडा फेर बदल कर
उसमे भी राहत की सांस नही लेने देते, स्कूल को शिक्षा का
मंदिर कहा जाता है, पर आजकल तो शिक्षा को पैसे कमाने का व्यवसाय बना के
रख दिया है विडंबना ये है कि इस ओर किसी का ध्यान ही नही जा रहा है| हर वर्ष कुछ पालक इस पुरे तंत्र के खिलाफ आवाज उठाते हैं पर कुछ भी नही
होता ओर तो ओर इस साल तो जो नया नियम लाया गया है, उसने तो ओर भी कहर ढा दिया है वह भी अभिभावकों के हित मे नही है, जब कोई सुनने वाला ही ना रह गया हो तो अब मध्यम वर्गीय परिवार बेचारा,
असहाय और खुद को ठगा सा महसुस कर रहा है, करे
भी तो क्या करे? पर अब वक्त आ गया है कि सभी को एकजुट होकर आवज उठाना ही होगी केवल सोशल मीडिया पर मेसेज पोस्ट करने से काम नही होने वाला है
वहीं सरकार को भी अब कुछ तो ध्यान इस और देना ही चाहिये,
आखिर इस देश के बच्चो की शिक्षा का सवाल है, जो देश का भविष्य है ।
"संपादित रुप नईदुनिया नायिका मे प्रकाशित"
