इंटरनेट
की दुनिया मे सोशल नेटवर्किंग साइटस ने जहां दुर बैठे हमारे रिश्तेदारों और परिचितों
से सीधे जोड दिया हैं, वहीं एक बहुत बडा मंच दिया है, अपने अंदर छुपी प्रतिभा को
सबके सामने रखने का और अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का, बहुत से लोगो को इससे फायदा भी हुआ है| तो कुछ लोग
लाईक, डिसलाईक के चक्कर मे डिप्रेस्ड भी होते है| सब चल रहा है| कोई बात नही बढीया है| पर मजा तो तब आता है, जब बडे-बडे उपदेश वाली पोस्ट
डाली जाती है| तो कई बार ऎसा लगता है, कि सब इतने समझदार और ज्ञानी है, तो दुनिया मे
फिर ये सब मनमुटाव, राग-द्वेष, लडाई-झगडा,
मारपीट, भ्रष्टाचार और पता नही क्या क्या कर
कौन रहा है? व्हाटसएप पर क्या ज्ञान गंगा बह रही है| हर रोज उच्च विचार या उक्तियाँ, प्रवचन
माला वाली पोस्ट है अर्थात ही ज्यादातर ये पोस्ट फारवर्डेड ही होती हैं| पर कभी कभी जब कोई ऎसा व्यक्ति उपदेशों को पोस्ट करता है, जिसने कभी वैसा व्यवहार
अपनी जिन्दगी मे किया ही ना हो, तो उन उपदेशों का जो मोल है, वही खत्म हो जाता है| एक बार एक ग्रुप मे एक सज्जन ने सुबह जल्दी उठने के बहुत सारे फायदे की
लिस्ट पोस्ट कर दी और सभी को पता है, कि ये बिना काम के कभी भी जल्दी नही उठते, चुँकि
मेरे इनसे मजाकिया संबंध है, सो मैने हिम्मत करके कह दिया, कि 'आप ने जो लिखा है,
वैसा तो आप खुद ही नही करते', तो जनाब ने भी शानदार जवाब दिया, “अच्छी बातें और
उपदेश दुसरों का भला करने के लिये होते है, खुद के लिये थोडे ही होते है, अब मै
इतना भी स्वार्थी नही, की ये सब मै नही कर रहा इसलिये आपको भी ना बताऊ”, तो लो ऎसे उत्तर मिलते हैं| वैसे ही एक सज्जन ने आज तक पैसे बचाने के
लिये कितने ही रिश्तेदारों को तकलीफ दी, वो किसी को मान दे
ना दे उन्हे सबने मान देना ही है| ऎसे ऎसे व्यक्ति भी जब
रिश्तों की परिभाषा समझाने वाले पोस्ट करते है या दार्शनिकता से भरे बडे बडे
उपदेशो वाली कहानियाँ, उक्तियाँ पोस्ट करते है, तो इतने सुंदर
विचार बेमानी हो जाते हैं, अर्थहीन लगने लगते है| फिर मुझे
वे शानदार सज्जन याद आते है, कि सच मै शायद ये सारे उपदेश
केवल पढने के लिये होते है, उसे अपने जीवन मे उतारने के लिये
नही पर कुछ लोग जो सालों से केवल इसलिये उपदेश और उक्तियाँ पढते आ रहे है. कि हम
जीवन के इस माया जाल मे फँस कर कहीं कुछ गलत ना कर बैठे, हमारे किसी भी स्वार्थी
इच्छा कि वजह से किसी को कोई तकलिफ ना हो, इसके लिये रोज एक जीवन दार्शनिक उक्ती
पढते हैं| पर आज तो ये बस दिखावा बन के रह गये हैं| कई लोग तो बेझिझक बोलते भी है, कि उच्च विचारों से जीवन
नही चलता वास्तविकता अलग होती है फिर जब इन विचारों को अपनाना ही नही है, तो क्या
ये लाईक, बहुत अच्छे, मस्त, शानदार विचार जैसे रिप्लाय के लिये ही रह गये है?