गुढी पाडवा
हिन्दु धर्म मे नववर्ष आगमन का त्यौहार है इसीदिन से हिन्दुओं का नववर्ष आरंभ होता
है,
भारत का सर्वमान्य केलेण्डर विक्रम संवत है, जिसका प्रारंभ चैत्र शुक्ल
प्रतिपदा से होता है। ब्रम्ह पुराण के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही ब्रम्ह देव ने
संपूर्ण सृष्टी की रचना प्रारंभ कर, काल गणना की भी शुरुआत
की थी इसी कारण इस दिन को सृष्टी के उत्पत्ती दिवस के रुप मे भी मनाया जाता है|
इस वर्ष पश्चिम (अंग्रेजी) केलेण्डर के अनुसार दिनांक २१ मार्च २०१५ शनिवार से नया मन्मथ नाम का
संवत्सर प्रारंभ होने जा रहा है यहां संवत्सर का अर्थ है वर्ष और हिन्दु धर्म मे
प्रत्येक वर्ष को एक नाम दिया गया है ऎसे साठ नाम हर वर्ष के लिये है जो
क्रमानुसार प्रत्येक वर्ष आते रहते हैं इस वर्ष जयनाम का सवंत्सर समाप्त होकर गुढी
पाडवा से मन्मथ नाम का संवत्सर अर्थात वर्ष शुरु होने जा रहा है, इस संवत्सर प्रणाली मे भी अंग्रेजी केलेण्डर की तरह ही बारह मास होते है
जिनमे चैत्र वर्ष का प्रथम मास फिर वैशाख, ज्येठ, आषाढ, श्रावण, भाद्रपद,
अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष,
पौष, माघ और अन्त मे फाल्गुन मास आता है तो हर
नये संवत्सर की शुरुआत प्रथम माह अर्थात चैत्र मास के प्रथम दिवस जिसे पाडवा या पडवा
कहते है से होती है चूँकि इस पाडवे के दिन हर घर पर नव वर्ष के अभिनंदन स्वरुप गुढी
लगाई जाती है इसीलिये इसे गुढी पाडवा कहते हैं अब प्रश्न यह है कि ये गुढी
वास्विकता मे है क्या? गुढी किस लिये लगाई जाती है? इसका
नाम गुढी किसने रखा? आदि आदि कई प्रश्न सामने आते है तो आज
हम सर्व प्रथम गुढी के इतिहास और उसकी परंपरा कहाँ से शुरू हुई, इसके बारे मे जानने की कुछ कोशिश करेंगे, भारत वर्ष
मे नव वर्ष पर गुढी लगाने की परंपरा युगो युगो से चली आ रही है गुढी का इतिहास बहुत प्राचिन होने से सबकी अपनी अपनी व्याख्या है, उसी कडी मे आधुनिक धारणा के अनुसार कुछ लोग कहते हैं कि सदियों पुर्व कोई
राष्ट्रीय ध्वज जैसी अवधारणा नही रही होगी और किसी भी प्रकार का हर्षोलास स्वागत
सत्कार या खुशी मनाने के लिये सजावट करने का कोई विशेष साधन उपलब्ध ना होने से नव
वर्ष स्वागत स्वरुप या किसी भी प्रकार के विजयी उत्सव पर घरों के द्वारों पर
पुष्प-पत्तीयों के तोरण और एक काष्ट पर रेश्मी वस्त्र डालकर उसपर कलश रखके इसप्रकार
की गुढी अर्थात झंडा बनाकर स्वागत करते होंगे पर वहीं पुराणों मे कहीं कहीं इस
गुढी को ब्रम्ह ध्वज भी कहा गया है क्योंकि ऎसा माना जाता है कि इस सकल सृष्टी की
रचना ब्रम्हा ने ही की है इसलिये उन्हे सम्मान देने, उनका अभिवादन
करने और अपनी खुशी व्यक्त करने के लिये, उन्हे धन्यवाद
स्वरुप यह ध्वज अपने अपने भवनो पर लगाकर इसे ब्रम्हा को समर्पित करने के फलस्वरुप
उन्ही के सम्मान मे इसे ब्रम्हध्वज नाम दे दिया गया है, तो
कुछ लोग गुढी का सृजन महाभारत की एक कथा को भी देते है इस कथा के अनुसार चेदी नामक
देश के एक राजा वसु ने बहुत तपश्चर्या कर इंद्र देवता को प्रसन्न किया था तब इंद्र
देव ने उनकी तपश्चर्या से प्रसन्न होकर उन्हे यश देने वाली एक वैजयंती माला और
अखण्ड भ्रमण करने के लिये एक विमान और राज्य कार्यभार सुचारु रुप से चलाने के लिये
एक राजदंड दिया था तब राजा वसु ने वापस अपने राज्य मे आकर राज्यभार ग्रहण करने के
पुर्व कार्यभार सुचारु रुप से चलाने के लिये उस राजदंड के ऊपर एक रेश्मी कपडा
लपेटकर उस पर सोने का चंबू(कलश) लगाकर उसे राजसभा के उच्च स्थान पर सुशोभीत कर इसे
गुढी नाम देकर उसकी पुजा की तथा इसे करने के पश्चात ही नविन सिरे से राज्य
कार्यभार आरंभ किया था तभी से इस कथा अनुसार पीढी दर पीढी से नया कार्य शुरु करने
या खुशीयों का स्वागत करने के लिये द्वार पर या भवन के उच्च स्थान पर इस गुढी को
लगाया जाता है| वहीं कुछ इतिहासकारों ने मराठा साम्रज्य के
समय गुढी के महत्व को भी वर्णित किया है जिसके अनुसार गुढी को विजयीध्वज ही कहा
जाता था शिवाजी महाराज का समय हो या किसी भी मराठा शासक के समय जब भी कोई राजा
युध्द मे विजय प्राप्त करता था तब यही गुढी आसमान की ओर हवा मे लहराई जाती थी जो
उस सेना के विजय का प्रतिक होता था तदपश्चात जब वह विजयी राजा अपने सैन्य बल के
साथ नगर मे प्रवेश करता था, तब भी उनके राज्य की प्रजा उनका स्वागत अपने
अपने घरों पर, घर के द्वारों या खिडकीयों पर यह विजयी ध्वज
अर्थात गुढी लगाकर और पुष्प वर्षा कर उनका अभिवादन करती थी इसीप्रकार से हर उत्सव
पर, विजय पर या नया वर्ष आरंभ पर मराठा शासित राज्यों मे
गुढी लगाई जाती थी जिस कारण से ही मराठी भाषीयों मे गुढी का महत्व ज्यादा होता है
और अमुमन सभी मराठी भाषी नव वर्ष पर आज भी गुढी लगाने की प्रथा उसी उल्लास के साथ
निभा रहे हैं| गुढी का का इतिहास अति प्राचिन होते हुये भी आज के इस
आधुनिक काल मे भी ये परंपरा जारी है ये ज्यादा महत्व पुर्ण है| गुढी को बनाने के लिये आज के युग मे एक लट्ठ या काठी या बास को गुढी
पाडवा के एक दिन पुर्व तेल और हल्दी लगा कर रखते है तथा गुढी पाडवे वाले दिन
सूर्योदय से पुर्व सुन्दर रेश्मी जरीदार साडी लगाकर उसपर चांदी, तांबे या स्टील का कलश, लोटा या ग्लास लगाकर उसमे
कडवी नीम के पत्तो की छोटीसी डगाल लगाते है तथा ऊपर से मीठी गाठीयों की माला डाल
कर गुढी को सु-सज्जित किया जाता है और फिर भवन के दाऎ
हाथ की ओर वाली हवादार खुले आसमान वाली जो
जगह होती है उसे साफ करके वहाँ रांगोली बनाकर गुढी को सुशोभीत करते है तथा फिर
सुर्योदय होने के साथ ही उसकी हल्दी-कुंकू, पुष्प और दीया आदी सामग्री से पुजा करते हैं तथा नववर्ष की सुर्योदय की इस
पावन बेला मे अपने प्रिय जनो के जिवन मे सुख समृध्दी बनी रहे यह मंगलकामना की जाती
है इस गगन दिशा की ओर लगी गुढी को उल्लास, विजय और खुशहाली
का प्रतिक माना जाता है| गुढी की पुजा मे लगने वाले कडवे नीम
की पत्तीयाँ खाने का भी रिवाज है जिससे रक्त शुध्द होता है और त्वचा रोग नही होते
अर्थात स्वस्थ रहने का संदेश उसमे निहीत है वहीं मीठी गाठीयों की माला सिखाती है
कि आप सदा मीठे बोल ही बोले अर्थात कडवा नीम खाकर और कडवे बोल सुनकर भी विचलित ना
हो स्वस्थ रहे और मीठा खाकर मधुर वाणी ही बोले अब इस गुढी पाडवे वाले दिन कुछ लोग
घरों मे अन्य पकवानों के साथ ही विशेष रुप से नेवैद्य मे पुरन पोळी तो कुछ लोग
श्रीखण्ड भी बनाते है इसके साथ ही नये पापड और कुरडई का सेवन भी आज से ही
शुरु किये जाते हैं क्योंकि इसी समय फसल काट कर नया धान्य भी तैयार होता है| इस दिन घरो
के सामने सुंदर रांगोलीयाँ बनाई जाती है तो कुछ लोग आज भी घरों के द्वारों पर फुल और
आम की पत्तीयों के तोरण लगाते है और बडी ही शालिनता से नये वर्ष का स्वागत करते
हैं वहीं एक-दुसरे को नववर्ष की शुभकामनाऎ देकर बडों के पैर छुकर उनका आशिर्वाद
लिया जाता है इसप्रकार आज भी यह सनातन पुरानी नव वर्ष की परंपरा सादगी से मनाई
जाती है| नईदुनिया नायिका मे प्रकाशित(18/03/2015)

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