दीपावली पर पूरे मन से बनाई रंगोली को एकत्रित करते हुए
एक खयाल आया यूँ ही मन में
कितना सुंदर है कोई परिकल्पना करना
फिर उसे साकार करने के लिए
उसका बड़े उत्साह और उमंग से सृजन करना
उसे बड़े प्यार से मंत्र-मुग्ध होकर निहारना,
और उसके मोह में डूब जाना
फिर कुछ दिनों बाद उसे उड़ते-बिखरते देख
खुद अपने ही हाथों से उसे समेट लेना
जैसे विधाता और प्रकृति का खेल
हमें इस धरा पर जन्म देना
इस सृष्टि में रचाना-बसाना
और फिर धरा का संतुलन बनाए रखने के लिए
पुनः अपने में ही समेट लेना
- भावना नेवासकर
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