Sunday, 11 August 2013

आडवाणी - मोदी


पिछले कुछ दिनो से लगातार माननीय आडवाणी जी और मोदी जी समाचारों की सुर्खियों मे बने हुए हैं। पहले बडी मुश्किलों से मोदी जी को बडा नेता माना गया, फिर ताजपोशी की गई, फिर आडवाणी जी का उसमे शामिल ना होना, फिर इस्तिफा देना ये सब इन्सानी महत्वकांक्षी जज्बातों का खेल है और कुछ भी नही ,  पर इस प्रकार के वर्चस्व के लिये होने वाले वाक युध्द, मुक युध्द आदि के लिये तो पुरूषों ने महिलाओं को बदनाम  ना - ना प्रसिध्द कर रखा है  जैसे कोई माँ अपने बेटे की शादी करना तो चाहती है, क्योंकी संसार आगे बढाना है, परन्तु उसे अपना वर्चस्व खो जाने की भी चिंता लगी रहती है पर फिर भी वह जैसे तैसे बडे मन से ठाठ-बाट से बेटे की शादी भी करवाती है,  तो भी "मुझसे ये घर-परिवार है", "मै अहम हूँ" यह जताने के लिये तरह-तरह के हथकंडे भी अपनाती हैं, और फिर जैसे जैसे बहु पुरानी होती जाती है, बहु का अस्तित्व परिवार में बढने लगता है तो फिर अब ये अस्तित्व की लडाई तु-तू मैं-मैं मे परिवर्तित हो जाती है, यही सब कुछ शायद इन दो नेताओं के बीच चल रहा है जो बहुत आम है, पर इस प्रकार की महत्वकांक्षी युध्द कुछ घरों मे ही होता है, पर बदनाम सास-बहु के साथ साथ पुरी महिला बिरादरी को कर दिया जाता है, और औरतें छोटे मन की होती हैं यह तो घोषित कर दिया गया है इससे भी मन नही भरा तो उन पर जोक्स बना दिये गए हैं, पर यह सब जब दो भद्र पुरूषों के बीच हो रहा है तो ये राष्ट्रीय समाचार बन गया है, जो देखो वॊ इस पर अपनी रॉय दे रहा है, ये भी तो एक तरह से वर्चस्व अर्थात सास बहु के झगडे के समान है फिर इसको इतना क्यों रोज उछाला जा रहा है, उस पर विशेषज्ञ लोग बहस भी कर रहें हैं देखा जाए तो इसप्रकार के अन्तर कलह कई संस्थाओ, पार्टीयों सभी जगहों पर होते है ये वर्चस्व और पॉवर की लडाई है जिसके लिये घरेलु महिलाऎं ज्यादा बदनाम है, पुरुष कम परन्तु सच तो ये है कि ये एक इंसानी गुण हैं अपनी पॉवर किसी ओर को हँसते हँसते देना इतना आसान नही होता, जिसकी महत्वकांक्षाए कम हो, जो बडे दिलवाला हो और जो  ये समझ ले की वह अपनी पारी खेल चुका अब सम्मान इसी में हैं कि वह आगे कि पीढी को कार्यभार देकर पितामह या मातामह बनकर मार्गदर्शन करना ही अब उसका कर्तव्य है तो ठीक है पर ऎसे मनुष्य बिरले ही मिलते हैं यही समस्या कुछ दिनो पहले हमारे महान बल्लेबाज के सामने भी आयी थी बडी मुश्किल से उन्होने अनमने मन से सन्यास लिया है खैर, यहा मुद्दा ये है कि ये अहम, पॉवर और वर्चस्व के लिये कुछ इन्सान कुछ भी करते हैं जो सरासर गलत है, पर फिर भी यदि उनमे पुरुष ये कार्य करते हैं तो उसे शिदद्त के साथ समाज के सामने रोज परोसा जाता है, पर वही कार्य कुछ महिलाऎं करती है तो सास बहु की तु तू मै मै करार दिया जाता है ऎसा दोगला व्यवहार क्यों? पुरूष ये सब करे तो पुरुषार्थ है अस्तित्व की लडाई है और महिला करे तो ................?

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