Saturday, 21 March 2015

गुढी पाडवा

गुढी पाडवा हिन्दु धर्म मे नववर्ष आगमन का त्यौहार है इसीदिन से हिन्दुओं का नववर्ष आरंभ होता है, भारत का सर्वमान्य केलेण्डर विक्रम संवत है, जिसका प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। ब्रम्ह पुराण के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही ब्रम्ह देव ने संपूर्ण सृष्टी की रचना प्रारंभ कर, काल गणना की भी शुरुआत की थी इसी कारण इस दिन को सृष्टी के उत्पत्ती दिवस के रुप मे भी मनाया जाता है| इस वर्ष पश्चिम (अंग्रेजी) केलेण्डर के अनुसार दिनांक २१ मार्च २०१५ शनिवार से नया मन्मथ नाम का संवत्सर प्रारंभ होने जा रहा है यहां संवत्सर का अर्थ है वर्ष और हिन्दु धर्म मे प्रत्येक वर्ष को एक नाम दिया गया है ऎसे साठ नाम हर वर्ष के लिये है जो क्रमानुसार प्रत्येक वर्ष आते रहते हैं इस वर्ष जयनाम का सवंत्सर समाप्त होकर गुढी पाडवा से मन्मथ नाम का संवत्सर अर्थात वर्ष शुरु होने जा रहा है, इस संवत्सर प्रणाली मे भी अंग्रेजी केलेण्डर की तरह ही बारह मास होते है जिनमे चैत्र वर्ष का प्रथम मास फिर वैशाख, ज्येठ, आषाढ, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और अन्त मे फाल्गुन मास आता है तो हर नये संवत्सर की शुरुआत प्रथम माह अर्थात चैत्र मास के प्रथम दिवस जिसे पाडवा या पडवा कहते है से होती है चूँकि इस पाडवे के दिन हर घर पर नव वर्ष के अभिनंदन  स्वरुप गुढी लगाई जाती है इसीलिये इसे गुढी पाडवा कहते हैं अब प्रश्न यह   है कि ये गुढी वास्विकता मे है क्या? गुढी किस लिये लगाई जाती है? इसका नाम गुढी किसने रखा? आदि आदि कई प्रश्न सामने आते है तो आज हम सर्व प्रथम गुढी के इतिहास और उसकी परंपरा कहाँ से शुरू हुई, इसके बारे मे जानने की कुछ कोशिश करेंगे, भारत वर्ष मे नव वर्ष पर गुढी लगाने की परंपरा युगो युगो से चली आ रही है  गुढी का इतिहास बहुत प्राचिन  होने से   सबकी अपनी अपनी व्याख्या है, उसी कडी मे आधुनिक धारणा के अनुसार कुछ लोग कहते हैं कि सदियों पुर्व कोई राष्ट्रीय ध्वज जैसी अवधारणा नही रही होगी और किसी भी प्रकार का हर्षोलास स्वागत सत्कार या खुशी मनाने के लिये सजावट करने का कोई विशेष साधन उपलब्ध   ना होने से नव वर्ष स्वागत स्वरुप या किसी भी प्रकार के विजयी उत्सव पर घरों के द्वारों पर पुष्प-पत्तीयों के तोरण और एक काष्ट पर रेश्मी वस्त्र डालकर उसपर कलश रखके इसप्रकार की गुढी अर्थात झंडा बनाकर स्वागत करते होंगे पर वहीं पुराणों मे कहीं कहीं इस गुढी को ब्रम्ह ध्वज भी कहा गया है क्योंकि ऎसा माना जाता है कि इस सकल सृष्टी की रचना ब्रम्हा ने ही की है इसलिये उन्हे सम्मान देने, उनका अभिवादन करने और अपनी खुशी व्यक्त करने के लिये, उन्हे धन्यवाद स्वरुप यह ध्वज अपने अपने भवनो पर लगाकर इसे ब्रम्हा को समर्पित करने के फलस्वरुप उन्ही के सम्मान मे इसे ब्रम्हध्वज नाम दे दिया गया है, तो कुछ लोग गुढी का सृजन महाभारत की एक कथा को भी देते है इस कथा के अनुसार चेदी नामक देश के एक राजा वसु ने बहुत तपश्चर्या कर इंद्र देवता को प्रसन्न किया था तब इंद्र देव ने उनकी तपश्चर्या से प्रसन्न होकर उन्हे यश देने वाली एक वैजयंती माला और अखण्ड भ्रमण करने के लिये एक विमान और राज्य कार्यभार सुचारु रुप से चलाने के लिये एक राजदंड दिया था तब राजा वसु ने वापस अपने राज्य मे आकर राज्यभार ग्रहण करने के पुर्व कार्यभार सुचारु रुप से चलाने के लिये उस राजदंड के ऊपर एक रेश्मी कपडा लपेटकर उस पर सोने का चंबू(कलश) लगाकर उसे राजसभा के उच्च स्थान पर सुशोभीत कर इसे गुढी नाम देकर उसकी पुजा की तथा इसे करने के पश्चात ही नविन सिरे से राज्य कार्यभार आरंभ किया था तभी से इस कथा अनुसार पीढी दर पीढी से नया कार्य शुरु करने या खुशीयों का स्वागत करने के लिये द्वार पर या भवन के उच्च स्थान पर इस गुढी को लगाया जाता है| वहीं कुछ इतिहासकारों ने मराठा साम्रज्य के समय गुढी के महत्व को भी वर्णित किया है जिसके अनुसार गुढी को विजयीध्वज ही कहा जाता था शिवाजी महाराज का समय हो या किसी भी मराठा शासक के समय जब भी कोई राजा युध्द मे विजय प्राप्त करता था तब यही गुढी आसमान की ओर हवा मे लहराई जाती थी जो उस सेना के विजय का प्रतिक होता था तदपश्चात जब वह विजयी राजा अपने सैन्य बल के साथ नगर मे प्रवेश करता था,  तब भी उनके राज्य की प्रजा उनका स्वागत अपने अपने घरों पर, घर के द्वारों या खिडकीयों पर यह विजयी ध्वज अर्थात गुढी लगाकर और पुष्प वर्षा कर उनका अभिवादन करती थी इसीप्रकार से हर उत्सव पर, विजय पर या नया वर्ष आरंभ पर मराठा शासित राज्यों मे गुढी लगाई जाती थी जिस कारण से ही मराठी भाषीयों मे गुढी का महत्व ज्यादा होता है और अमुमन सभी मराठी भाषी नव वर्ष पर आज भी गुढी लगाने की प्रथा उसी उल्लास के साथ निभा रहे हैं| गुढी का का इतिहास अति प्राचिन होते हुये भी   आज के इस आधुनिक काल मे भी ये परंपरा जारी है ये ज्यादा महत्व पुर्ण है| गुढी को बनाने के लिये आज के युग मे एक लट्ठ या काठी या बास को गुढी पाडवा के एक दिन पुर्व तेल और हल्दी लगा कर रखते है तथा गुढी पाडवे वाले दिन सूर्योदय से पुर्व सुन्दर रेश्मी जरीदार साडी लगाकर उसपर चांदी, तांबे या स्टील का कलश, लोटा या ग्लास लगाकर उसमे कडवी नीम के पत्तो की छोटीसी डगाल लगाते है तथा ऊपर से मीठी गाठीयों की माला डाल कर गुढी को सु-सज्जित किया जाता है और फिर  भवन के दाऎ हाथ की ओर वाली   हवादार खुले आसमान वाली जो जगह होती है उसे साफ करके वहाँ रांगोली बनाकर गुढी को सुशोभीत करते है तथा फिर सुर्योदय होने के साथ ही उसकी हल्दी-कुंकू, पुष्प और दीया आदी सामग्री से पुजा करते हैं तथा नववर्ष की सुर्योदय की इस पावन बेला मे अपने प्रिय जनो के जिवन मे सुख समृध्दी बनी रहे यह मंगलकामना की जाती है इस गगन दिशा की ओर लगी गुढी को उल्लास, विजय और खुशहाली का प्रतिक माना जाता है| गुढी की पुजा मे लगने वाले कडवे नीम की पत्तीयाँ खाने का भी रिवाज है जिससे रक्त शुध्द होता है और त्वचा रोग नही होते अर्थात स्वस्थ रहने का संदेश उसमे निहीत है वहीं मीठी गाठीयों की माला सिखाती है कि आप सदा मीठे बोल ही बोले अर्थात कडवा नीम खाकर और कडवे बोल सुनकर भी विचलित ना हो स्वस्थ रहे और मीठा खाकर मधुर वाणी ही बोले अब इस गुढी पाडवे वाले दिन कुछ लोग घरों मे अन्य पकवानों के साथ ही विशेष रुप से नेवैद्य मे पुरन पोळी तो कुछ लोग श्रीखण्ड भी बनाते है इसके साथ ही नये पापड और कुरडई का सेवन  भी आज से ही शुरु किये जाते हैं क्योंकि इसी समय फसल काट कर नया धान्य भी तैयार होता है| इस दिन  घरो के सामने सुंदर रांगोलीयाँ बनाई जाती है तो कुछ लोग आज भी घरों के द्वारों पर फुल और आम की पत्तीयों के तोरण लगाते है और बडी ही शालिनता से नये वर्ष का स्वागत करते हैं वहीं एक-दुसरे को नववर्ष की शुभकामनाऎ देकर बडों के पैर छुकर उनका आशिर्वाद लिया जाता है इसप्रकार आज भी यह सनातन पुरानी नव वर्ष की परंपरा सादगी से मनाई जाती है|           
नईदुनिया नायिका मे प्रकाशित(18/03/2015)              

Wednesday, 4 February 2015


                                                               बबली 
उस दिन सुबह से ही तेज बारिश हो रही थी मैंने रोज की तरह अपनी बेटीयों को तैयार किया और मेरे पति राहुल उन दोनो को लेकर कार मे बैठे और उन्हे स्कुल छोडने के लिये निकल पडे मैने दोनो को टाटा बाय -बाय किया, जैसे ही उनकी कार गई और यहॉ कोहराम मच गया, हमे मालुम ही नही था कि कार के नीचे बबली और उसके नवजात बच्चे सो रहे थे बारिश तेज थी जिस कारण से उनके ऊपर से छत निकल जाने से सब जोर जोर से पीं पीं करके चिल्लाने लगे, बबली हमारी कॉलोनी की एक कुतिया थी जो कई सालों से हमारे दो - चार घरों के आस-पास ही रहती थी चुँकि हम उसे खाने पीने को दिया करते थे, जिस कारण से वह हमे अपना ही समझने लगी थी, हमे भी उसके इस अपनत्व का एहसास था इसीलिये हम भी उसका ध्यान रखते थे, उस दिन इतनी तेज बारिश मे शायद रात को ही उसने हमारी कार के नीचे अपना ठिकाना बनाया होगा, जो हमे पता ही नही था । वो तो खुदा का शुक्र है कि कोई भी आहत नही हुआ, उन्हे देखकर लग रहा था कि बबली ने अभी दो-तीन दिन पहले ही इन पिल्लों को जन्म दिया होगा, ये सब हमारे लिये आम बात थी, वह हर साल एक खेप तो जन ही लेती थी उनमे से कुछ गाडियों के नीचे आ जाते तो कुछ बच जाते, जो बच जाते वे भी हमसे उतने ही वफादार थे ।
 “ बबली “  ये नाम भी हमने ही उसका प्यार से रखा था, पहले उसका एक साथी कुत्ता भी था और ये जोडा हमेशा साथ ही रहा करता था और उसी समय फिल्म बंटी और बबली भी रिलीज हुई थी सो हमने इस जोडे का नाम भी यही रख दिया था पर कुछ दिनो से बंटी कॉलोनी मे दिखाई नही दे रहा था, मालुम नही कहॉ चला गया था पर बबली फिर भी हमारे दो - तीन घरों के आस पास ही रहती थी । अब इधर ये कोहराम तेज बारिश देख कर मुझे कुछ सुझ नही रहा था, बबली के बच्चे बारिश मे भीग रहे थे और बबली हैरान परेशान होकर रोने लगी तभी उसने हमारे पास के खाली प्लॉट से लगी महाशब्दे जी के घर की दिवार के सहारे गडडा खोदना शुरु कर दिया इधर मुझे उन बच्चों को उठाने मे डर लग रहा था सो मै अपनी छतरी लेकर उनके पास बैठ गई ताकि वे बारिश से ना भीगे और राहुल का इंतजार करने लगी, कि वो आये तो हम इनके लिये कुछ कर सके, तब तक बबली ने भी गड्डा खोदना जारी रखा जैसे ही उसने मुझे उसके बच्चों के समीप बैठे देखा वो थोडी शांत हुई और अब एकाग्रता से अपने बच्चो की व्यवस्था मे लग गई फिर कुछ ही देर मे वो मेरे पास आयी और मुँह मे होले से अपने एक बच्चे को उठाया और उस गड्डे मे रख दिया यह देखकर मुझे एहसास हुआ कि माँ तो माँ ही होती है चाहे इन्सान की हो या किसी अन्य जीव की माँ का कोई सानी नही है सचमुच बच्चो के लिये तो धरती पर भगवान का दुसरा रुप ही माँ है जो हर हाल मे अपने बच्चे के लिये सबकुछ करती है, अपनी खुद की परवाह किये बिना, जो आज ये जानवर बबली भी कर रही है, उतने मे ही राहुल भी आ गए वे माँजरा भाँप कर तुरंत घर के अन्दर जाकर एक ताट का बोरा ले कर आए और हमारे घर के बरामदे मे बिछा कर जल्दी से एक-एक करके उन पिल्लों को उठाकर अंदर रख दिया ये देखते ही बबली भी अंदर दौडी चली आयी और अब सभी हमारे घर के बरामदे मे सुरक्षित और शांत थे बारिश कभी तेज कभी रिमझीम ऎसे लगातार चलती रही, अब दो दिन तो हमने जैसे तैसे निकाल दिए पर मेरी भी दो छोटी बेटीयॉ है उन्हे इन्फेक्शन ना हो जाए यह सोच कर हम कॉलोनी मे ऎसी जगह तलाश करने लगे जहाँ ये सब सुरक्षित रह सके तब हमने देखा कि हमारे कॉलोनी मे एक घर करीब दो-तीन सालॊ से बंद पडा है तो फिर क्या था हमने व हमारे पडोसी लबडे जी ने मिलकर उन्हे सकुशल उस सुने मकान के बरामदे मे शिफ्ट कर दिया ओर उनके सारे खाने-पीने की व्यवस्था कर दी तभी शाम को उस सुने मकान के पास मे रहने वाली एक आंटी आयी ओर मुझे बोली तुमने किसकी इजाजत से वहॉ उस कुतिया ओर उसके बच्चों को रखा उस मकान की जवाबदारी हमारे पास है ओर वहॉ उन सबने कितनी गंदगी कर दी है देखो जरा, तब मैने कहा आंटी चलो मे सब साफ कर देती हूँ और कुछ दिनो की बात है बारिश का मौसम भी चला जाएगा और बच्चे भी थोडे बडे हो जाऎंगे तब वहॉ कोई नही आएगा आप चिंता मत करो मैने सोचा था ये आंटी बडी "धार्मिक" हैं रोज सुबह जल्दी उठ कर मंदिर जाती हैं बिना नागा किए बहुत सेवा भावी भी हैं वो इस बात को समझ जाएंगी परन्तु वो नही मानी तब पता चला इन्सानियत केवल इंसानो के लिये ही होती है, भगवान के बनाए अन्य प्राणीयों के लिये नही होती है, आखिर वे नही मानी फिर हमने और लबडे जी ने मिलकर पुनः उसी खाली प्लॉट की दीवार के सहारे दो तरफ ईटें रखकर उस पर एक छतरी रख दी और वहॉ उन्हे शिफ्ट कर दिया पर देखिये रातभर मे पता नही वो छतरी ही कोई उठाकर ले गया तब फिर लबडे जी ने उन इटों पर प्लास्टिक की शीट व्यवस्थित जमा कर रख दी पर इन सब मे बारिश मे भीगने की वजह से और इंफेक्शन से बबली के दो पिल्ले चल बसे जिन्हे राहुल ने हमारे घर के सामने वाले ग्रीन फिल्ड एरिया मे दफना दिया, बाकीयों को हम, मिरजकर जी, चंदानी जी बारी बारी से ध्यान रख रहे थे तभी अचानक एक दिन बबली गायब हो गई उसके पिल्ले भुख के मारे रोने लगे हमने उन्हे कटोरे मे दुध दिया पर उन्हे पीते भी नही आ रहा था पर भुख भी लग रही थी उन्होने कटोरे पर ही पैर दे मारा तो सारा दुध वंही पर ढुल गया जिसे धीरे धीरे उन्होने चाटना शुरू किया और शायद तभी उन्हे समझ आया था कि उपर का दुध कैसे पीया जाता है, दो दिन ऎसे ही चलता रहा हम बबली को ढुंढ रहे थे और सोच रहे थे की वो ऎसे कैसे कँही भी चली गई अपने दुध मुँहे बच्चों को छोडकर कुछ भी समझ नही आ रहा था कि कब तक हम इनका ध्यान रखेंगे, रात को कुछ हो गया तो फिर ? ऎसी कई आशंकाओ से हम सब परेशान हो रहे थे पर बबली का कुछ अता पता नही था तब एक दिन अलसुबह राहुल घुमने निकला, तो उसने रिंग रोड पर साइड मे पडे एक कुत्ते की रोने की आवाज सुनी और जैसे ही वह उसके पास गया वह कुत्ता ओर जोर से रोने लगा उसने करीब पहुँच कर देखा तो वह ओर कोई नही बबली ही थी वह भी घायल अवस्था मे, ओर उठ भी नही पा रही थी उसने राहुल को पहचान लिया था इसीलिये जोर जोर से कराह कर उसे अपने पास बुलाना चाहती थी राहुल ने उसे प्यार से सहलाया तो वो और जोर से कराहने लगी अब तक राहुल समझ चुका था कि बबली के लिये किसी वेटेनरी डॉक्टर को बुलाना ही पडेगा यह सोच कर वह घर पर आने के लिये बढा तो वह और रोने लगी शायद वह बिना बोले भी आँखों से बोल रही थी प्लिज मुझे छोड कर मत जाओ, मेरी मदद करो परन्तु कुछ भी एक्शन लेने के लिये घर आना जरुरी था क्योंकि उसके पास उस समय सेलफोन भी नही था वह तुरंत घर आया और सारा माजरा हमे बताया ये सुनते ही मै और मेरी भांजी रुचि हम दोनो से रहा नही गया हम दौडते हुए बबली के पास पहुँचे वह हमे दुर से ही देखकर पहचान गई और जोर जोर से कराहने लगी उधर राहुल हमारे परिचीत वेटेनरी डॉ. सिरवानी जी को फोन लगाने मे व्यस्त था इधर बबली जोर जोर से कराह रही थी और हम उसे सहला कर सांत्वना देने की कोशिश कर रहे थे उतने मे ही एक सज्जन जो स्कुटर से जा रहे थे वे रुके और एक ब्रेड का पेकेट लेकर हमारे पास आए और बोले क्या ये आपका कुत्ता है? मैने कहा नही पर हम इसे जानते हैं ये हमारी कालोनी की है तब वे बोले इसका एक्सिडेंट कल मेरी कार से ही हुआ है, और तब से मै बेचैन हूँ सुबह भी मै दो बार आया पर ये कुछ खा नही रही है मै इसका इलाज भी कराना चाहता हूँ क्या आप लोग मेरी मदद करेंगे? इसका ये हाल मेरी ही वजह से हुआ है इसके लिये मुझसे जो बन पडेगा मै करने को तैयार हूँ । रुचि और मै हम दोनो ही आश्चर्य से उस सज्जन की ओर देखने लगे उन सज्जन की आँखों मे प्रायश्चित की भावना और बबली को हो रहे दर्द का एहसास साफ दिख रहा था तभी राहुल आया ओर बोला डॉ सिरवानी तो आउट ऑफ स्टेशन है अब तो हम ये ही कर सकते हैं कि या तो इसे कार मे डाल कर वेटेनरी हॉस्पिटल ले जाऎं या फिर वहा से किसी को बुला कर लाऎ तभी हमारे पडॊसी चंदानी जी का भतीजा भी हमारी मदद के लिये आया तब राहुल तुरंत कार लेकर आया और एक बोरी की सहायता से वे दोनो मिलकर बबली को उठाने का प्रयास करने लगे पर बबली को इतना ज्यादा दर्द हो रहा था कि वह खुद को उठाने नही दे रही थी इस वजह से यह भी डर लग रहा था कि कहीं ये काट ना ले सो राहुल मुझसे बोला एक काम करो तुम वेटेनरी हॉस्पिटल जाओ ओर देखो कोई वहां से आ सकता हो तो उसे ले आओ तब तक हम इधर कोशिश करते हैं यदि इसे हमने कार मे बैठा लिया तो मै तुम्हे कॉल कर दुंगा जानवरों का हॉस्पिटल हमारे घर से तीन चार कि.मी. की दुरी पर ही था, मैने हाँ कहा ओर जाने को निकली कि तभी वे सज्जन बोले चलो मै भी आपके साथ चलता हूँ मै राहुल कि ओर देखने लगी तो राहुल बोला ठीक है और फिर वे सज्जन और मै हम दोनो उन्ही की स्कुटर से वेटेनरी हॉस्पिटल पहुँचे, ये सरकारी अस्पताल था हमारी बात भी कोई सुनने को तैयार नही था तब मेरे साथ आए सज्जन ने वहां के एक हेल्पर को सौ रुपये दिये ओर सारा माजरा बताया और उनसे हमारे साथ चलने का अनुरोध किया पॉकेट मे सौ रुपये आते ही उसने उसके बॉस डॉ. से परमिशन लेकर तुरंत चलने को तैयार हो गया तभी मेरे सेलफोन पर राहुल का कॉल आया उसने कहा हमने जैसे तैसे बबली को कार मे बैठा लिया है तुम वही रुको हम वहीं आ रहे है तो फिर हम वही रुक गए , जब ये लोग बबली को लेकर कार से आए तो हम सभी की एक स्ट्रीट डॉग(बिच) के लिये ये उठा पटक देख कर डॉ भी अपनी चेअर से उठ कर कार मे ही बबली को देखने पहूँचे और चेक करने के उपरान्त उन्होने बताया की इसकी रीढ की हडडी जा चुकी है जिसकी वजह से इसके पिछले पैर पेरालाइस्ड हो गए है मै दवाई लिख देता हूँ तो इसका दर्द कम हो जाएगा पर अब ये ठीक तो नही हो पाएगी ये सब सुन कर हम सभी हताश हो गए तभी राहुल बोला मै दवाई लेकर आता हूँ फिर चलते हैं तब वे सज्जन बोले आप लोग चलिये दवाईयां मे ले आता हूँ उनकी आँखों मे पानी भर आया था जो हम सभी को साफ दिखायी दे रहा था, मैने अपनी जिन्दगी मे पहली बार इतना भावुक पुरुष देखा था जिसे अपनी गलती की वजह से एक अनजान जानवर को हो रहे तकलीफ से इतना दर्द हो रहा था, कि वो उनकी आँखों से बह रहा था हम सबने उन्हे समझाया और घर की ओर निकलने लगे तभी वहा खडे सभी लोग जो ये सब देख रहे थे, उनमे से वह हेल्पर जिसने सौ रुपये लिये थे उसे पता नही क्या हुआ उन सज्जन के समीप आया ओर सौ रुपये उनके हाथ मे वापस थमा कर उनके कंधे पर सांत्वना भरा हाथ रख कर चला गया ये सब देखकर उस दिन ऎहसास हो रहा था कि आज भी इन्सानो मे इतनी इन्सानियत और भावनाए दबी हुइ है जो कंही इस कलयुगी भौतिक लालसा के दौड मे किसी मे दिखायी ही नही देती है पर फिर भी, आज भी सभी का नैतिक पतन नही हुआ है खैर बाद मे हम सब निराश होकर लौट आए अब रोज हम कालोनी वाले बारी बारी से बबली को खाना देना, दवाई देना वो जब कभी रोए तो उसे सांत्वना देना सब यूं ही चल रहा था, दो दिन बाद हमारे परिचित वेटेनरी डॉ सिरवानी जी को भी हमने बुलाया जो उस दिन आउट ऑफ स्टेशन थे उन्होने भी बबली को देखा ओर वही कहा जो अस्पताल के डॉक्टर ने हमसे कहा था उन्होने बबली को दर्द ना हो उसका एक इंजेक्शन उसे लगाया और अपनी तरफ से कुछ टॉनिक देकर बिना फीस लिये ही चले गए | वे सज्जन भी आठ दिन तक रोज अपनी कम्पनी से सीधे हमारे घर ब्रेड और दुध की एक थैली बबली के लिये ले कर आते, कुछ दिनो बाद बबली ने खाना पीना भी छोड दिया तब हमने उन सज्जन को बताया कि अब वो कुछ भी खा नही रही है प्लिज अब आप उसके लिये कुछ भी मत लाइये, वे बडे उदास होकर चले गए उस दिन के बाद उनका आना भी बंद हुआ, उसके दुसरे दिन बबली अपने शरीर को घसीटते घसीटते बाहर सडक पर आ गई और रात भर मे ही पता नही सरकते सरकते कंही चली गई इधर पता नही कैसे उसके दो पप्पी ओर चल बसे बाकी बचे हुए तीन को हमने अपने घर के नजदीक जगह बना दी थी और अब वे भी धीरे धीरे सामान्य जिन्दगी जीने लगे थे यंहा तक की आस-पास के बच्चों के साथ खेलने भी लगे थे तभी दो-तीन दिन बाद बबली पुनः अपने बच्चो के पास आयी सारा दिन उनके साथ रही, हमने देखा वो अपने बच्चो को बहुत प्यार कर रही थी, फिर रात मे पता नही कहॉ चली गई, इधर उसका इन्फेक्शन इन बचे हुए पिल्लों को भी हो गया जिससे एक के बाद एक तीनो चल बसे फिर कुछ दिन बाद पता चला कि मेन रोड के किनारे ही बबली ने भी दम तोड दिया इस तरह उसका और उसकी आखरी खेप का दर्दनाक अन्त हुआ हम कई दिनो तक उसे भुला नही पाए |

Friday, 4 July 2014

प्रधानमंत्री


हमारे नए नवेले जनता के चहेते प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को हार्दिक बधाईयाँ जिनके पिछले कई वर्षों के अथक प्रयासों से आज वे जनता के सबसे प्रिय नेता हैं उनका वो दबंग अंदाज, सुदृढ व्यक्तित्व, सटीक वाक्य लिये प्रखर बोलना, उनका आत्मविश्वास, उनकी कार्य प्रणाली, उनकी पुर्व नियोजित योजनाऎ, उनकी मार्केटिंग स्ट्रेटेजी सभी लाजवाब और इन सबसे ऊपर उनका जोशे जुनून जो किसी को भी अंदर से हिला के रख देता है जब वे अपनी बुलंद विश्वास से भरी आवाज मे ये सब कहते है जैसे
(१) भाईयों और बहनो ये वक्त देश के लिये जीने का है  
(२) अगर सवा सौ करोड लोग एक कदम आगे चलेगें तो देश सवा सौ करोड आगे बढ जाएगा  
(३) मै परिश्रम की पराकाष्टा कर दुंगा 
(४) हमे सिंगापुर और अन्य विदेशों जैसा अपने देश को साफ सुथरा बनाना है इसके लिये आप लोग मुझे साथ दे आदि आदि
सचमुच अगर वे इतने सारे वादे पुरे करने मे सफल हो जाते है, जो कि तभी संभंव है जब कि उनका ये जज्बा बरकरार रहे, सभी राजनीतिक  लोग भी उनके इस नेक कार्य मे उनका साथ दे ना कि उनके लिये परेशानी खडी करे और जनता भी उनके कहे अनुसार उनका साथ दे तो शायद वास्तव मे ही कुछ सालो मे हमारा भारत पुनः एक महान सुखी समृध्द राष्ट्र बन सकता है ये अलख मोदी जी ने कल्पना मे तो कम से कम जगा दी है परन्तु हमेशा से ही जयचंदो की कमी नही रही है फिर भी सब ठीक ठाक रहा तो शायद आगे आने वाले सालों मे ये एक युग प्रवर्तक, प्रेरणादायी देश भक्त कुशल शासक नरेन्द्र मोदी के नाम से जाने जा सकते हैं और हम सब उसके गवाह होंगे और अपने आपको गौरान्वित महसुस कर सकेगें कि जो कभी हमने इतिहास मे कुछ कुशल शासको के बारे मे पढा था कि उनके शासन काल मे राम राज्य था प्रजा खुशहाल थी वो हम भी आज प्रत्यक्ष जी रहे होंगे यदि ऎसा हो जाए तो आने वाले इतिहास मे श्री नरेन्द्र मोदी जी एक कुशल शासक के रुप मे सदा के लिये अमर हो सकते है और काश ऎसा ही हो अन्यथा हम जी तो रहे ही है |

Sunday, 11 August 2013

आडवाणी - मोदी


पिछले कुछ दिनो से लगातार माननीय आडवाणी जी और मोदी जी समाचारों की सुर्खियों मे बने हुए हैं। पहले बडी मुश्किलों से मोदी जी को बडा नेता माना गया, फिर ताजपोशी की गई, फिर आडवाणी जी का उसमे शामिल ना होना, फिर इस्तिफा देना ये सब इन्सानी महत्वकांक्षी जज्बातों का खेल है और कुछ भी नही ,  पर इस प्रकार के वर्चस्व के लिये होने वाले वाक युध्द, मुक युध्द आदि के लिये तो पुरूषों ने महिलाओं को बदनाम  ना - ना प्रसिध्द कर रखा है  जैसे कोई माँ अपने बेटे की शादी करना तो चाहती है, क्योंकी संसार आगे बढाना है, परन्तु उसे अपना वर्चस्व खो जाने की भी चिंता लगी रहती है पर फिर भी वह जैसे तैसे बडे मन से ठाठ-बाट से बेटे की शादी भी करवाती है,  तो भी "मुझसे ये घर-परिवार है", "मै अहम हूँ" यह जताने के लिये तरह-तरह के हथकंडे भी अपनाती हैं, और फिर जैसे जैसे बहु पुरानी होती जाती है, बहु का अस्तित्व परिवार में बढने लगता है तो फिर अब ये अस्तित्व की लडाई तु-तू मैं-मैं मे परिवर्तित हो जाती है, यही सब कुछ शायद इन दो नेताओं के बीच चल रहा है जो बहुत आम है, पर इस प्रकार की महत्वकांक्षी युध्द कुछ घरों मे ही होता है, पर बदनाम सास-बहु के साथ साथ पुरी महिला बिरादरी को कर दिया जाता है, और औरतें छोटे मन की होती हैं यह तो घोषित कर दिया गया है इससे भी मन नही भरा तो उन पर जोक्स बना दिये गए हैं, पर यह सब जब दो भद्र पुरूषों के बीच हो रहा है तो ये राष्ट्रीय समाचार बन गया है, जो देखो वॊ इस पर अपनी रॉय दे रहा है, ये भी तो एक तरह से वर्चस्व अर्थात सास बहु के झगडे के समान है फिर इसको इतना क्यों रोज उछाला जा रहा है, उस पर विशेषज्ञ लोग बहस भी कर रहें हैं देखा जाए तो इसप्रकार के अन्तर कलह कई संस्थाओ, पार्टीयों सभी जगहों पर होते है ये वर्चस्व और पॉवर की लडाई है जिसके लिये घरेलु महिलाऎं ज्यादा बदनाम है, पुरुष कम परन्तु सच तो ये है कि ये एक इंसानी गुण हैं अपनी पॉवर किसी ओर को हँसते हँसते देना इतना आसान नही होता, जिसकी महत्वकांक्षाए कम हो, जो बडे दिलवाला हो और जो  ये समझ ले की वह अपनी पारी खेल चुका अब सम्मान इसी में हैं कि वह आगे कि पीढी को कार्यभार देकर पितामह या मातामह बनकर मार्गदर्शन करना ही अब उसका कर्तव्य है तो ठीक है पर ऎसे मनुष्य बिरले ही मिलते हैं यही समस्या कुछ दिनो पहले हमारे महान बल्लेबाज के सामने भी आयी थी बडी मुश्किल से उन्होने अनमने मन से सन्यास लिया है खैर, यहा मुद्दा ये है कि ये अहम, पॉवर और वर्चस्व के लिये कुछ इन्सान कुछ भी करते हैं जो सरासर गलत है, पर फिर भी यदि उनमे पुरुष ये कार्य करते हैं तो उसे शिदद्त के साथ समाज के सामने रोज परोसा जाता है, पर वही कार्य कुछ महिलाऎं करती है तो सास बहु की तु तू मै मै करार दिया जाता है ऎसा दोगला व्यवहार क्यों? पुरूष ये सब करे तो पुरुषार्थ है अस्तित्व की लडाई है और महिला करे तो ................?

Thursday, 17 May 2012

आईचा ५०वा आगमन वर्षोत्सव (Anniversary)


आज झाले पन्नास वर्ष पूर्ण या कुटुंबात आमच्या आई चे,
आम्ही   म्हट्ल चला करु साजरा या दिवसा ला सर्वे मिळून,
तर आई म्हणाली काय कौतुक अता या दिवसा चे,
ते असते तर ........... ते असते तर .........
थांबून गेली रुध्द गळया ने .....
तेंव्हा ठरवल सांगू या आज तिला या लग्ना च्या दिवसा ची महती अतिसुन्दर,
प्रत्येक मुली च्या जीवनात जरी लग्ना ची ही वेळ अप्रतिम  सुन्दर,
तरी ही कुठे तरी भीति असे नवीन   माणसांशी जुळवन्याची,
जीवनात हा एक पडाव असा आहे जेंव्हा जावे लागते  मुलीला जन्म झालेल्या   घरा ला सोडुन,
जन्मा चे नाते प्रेमाचे बंधन हसले, रुसले, भांडले  तरी एक मेका ला स्वताच  क्षमा करुन परत एकच.
पण लग्नांतर चे हे नाते असते अवघड,
जोड याला घट्ट देण्या करिता मागतो हा समर्पण.
जरी आपल्या नव-याच हात धरुनी आली तु या घरात  पुढील जीवना ची वाट्चाल कराया,
तरी जास्त वेळ सहवास असतो त्याच्या कुटुंब सोबतच.
म्हणुनी लग्नाचा वाढ दिवस उत्सव आहे कुटुंबात  एका नवीन
माणसाचा आगमन उत्सव
अण आज आहे आमच्या   आईचा ५०वा आगमन वर्षोत्सव,
तर का नको करावा आम्ही हा दिवस साजरा -
जिच्या तपस्या त्याग प्रीति आणि आशिर्वादा मुळे अम्ही सर्व झालो स्टेबल,
तर देण्या करिता तिच्या या अमूल्य   यशस्वी   कर्तव्याला “लाईफ़ टाईम अचीव्हमेंट” रुपी हा मान आम्हाला वाटतो, हाच दिवस सुटेबल.                                                                                                                                              

१६/०५/२०१२                                                       सौ. भावना अमित नेवासकर 

Tuesday, 26 July 2011

सा रे गा मा पा की नायाब महफीलें


zee t.v. का सा रे गा मा पा कार्यक्रम मैं पिछ्ले कई वर्षों से देख रही हू मुझे याद है जब पहली बार यह कार्यक्रम शुरू हुआ था, तब इसके सुत्रधार आज के प्रख्यात गायक सोनु निगम जी थे उसके बाद से लेकर आजतक इतने वर्षों मे जाने कितने प्रतिभागी आए, कितने ही निर्णायक बदले, कितने ही सुत्रधार बद्ले पर नही बदला तो इसकी गुणवत्ता।  यह संगीमय कार्यक्रम आज भी उसी ताजगी व क्वालिटी के साथ हमें संगीत की ना भुलने वाली कई महफीले पेश करता आ रहा है।  पता नही कंहा कंहा से ये गायक गायिका चुनकर लाते हैं जो देखते ही देखते इतने लाजवाब अतुलनीय गायन पेश करते हैं कि दिल पर अपनी छाप छोड जाते हैं जो हमारे जैसे कई रसिकों के लिये हमेशा के लिये एक अदभुद अविस्मर्णिय पल बन जाते है. वैसे ही अभी हाल ही मे चल रहा लिटिल चेंप मे भी छोटे छोटे गायक गा रहें है लगता ही नही की, ये नन्हे बच्चे गा रहें है ये तो गायन के महारथी नजर आते है, क्या गाते है, क्या आत्मविश्वास है कुछ बच्चे तो कमाल ही कर जाते है उनमे से ही अजमत को सुनना तो वाकई किसी ख्यात रियाज़मंद गज़ल गायक को सुनने जैसा लगता है वहीं वेदा ऎसा गाती है मानो कोई प्रोफेशनल गायीका गा रही हो नितीन व अनमोल का गाना तो दिल को छु जाता है ऒर सलमान व सजंना भी गज़ब का गा रहे है कमाल की बात यह है की ये सभी क्लासिकल टच लिये हुये है जिससे ये नये गाने तो सहजता से गाते ही है पर कई पुराने क्लासिकल गीत भी उनके भावों को बरकारार रखते हुए गाते है। मै धन्यवाद देना चाहती हुं सारेगामापा की टीम को व उनके डायरेक्टर को जिन्होने इतने वर्षो से अपनी गुणवत्ता बनाए हुए हैं व इनके साजिंदे भी कमाल का बजाते है। भगवान से दुआ करती हुं की ये कार्यक्रम ऎसे ही हमेशा चलता रहे अपने इसी मॊलिक अंदाज को बरकरार रखते हुए।